भूत से साक्षात्कार बजरिए विजयगढ़ किला
पुरातत्व व संस्कृति
‘तत्व ही तत्व हैं हर ओर
हर ओर नहीं होते आदमी
हर आदमी, आदमी नहीं होता
जो आदमी नहीं होता
वह भी होता है कुछ
कुछ क्या होता है
होता हो शायद
तत्व का पुरातत्व
जहां पुरातत्व होता है
वहां नहीं होते आदमी
जहां नहीं होते आदमी
वहां होते है तत्
जन-मन की हत्यारी
वृत्तियों-प्रवृत्तियांे को
जो बना देते हैं
आदमी को पुरा-आदमी या
पुरातत्व.....’
भूत से साक्षात्कार बजरिए विजयगढ़ किला
नई सदी का प्रारंभ, जाड़े की गुन-गुनी धूप सेंकने की गरज से मैं चारपाई पर अधलेटा हुआ था एवं हंस का ताजा अंक पढ़ रहा था। उसमें से सीखों का सिखाने की बारीकियां को चुन रहा था कि बाउण्ड्री के छोटे से फाटक ने खट किया, बाहर फाटक पर आकाशवाणी ओबरा के कृषि कार्यक्रम अधिकारी सुशील राय जी खड़े थे, उनके साथ में आकाश वाणी के ही निराला जी भी एक टक मेरी तरफ ताक रहे थे। मैं था कि केवल चढ़डी के साथ, कम्बखत लुंगी भी ऐन वक्त पर अपनी गांठे खोल मुझे नंगा कर जाती है। झट लुंगी सहेजा, दौड़ा फाटक की तरफ हाहाकारी दुआ-सलाम, आइए भाई आइए! अरे! उधर देखिए निदेशक महोदय जीप पर हैं, यानि कि कोतवाल साहब!
अब मैं लंुगी में किसी शरीफ की तरह ढंका हुआ था। ऊपर गंजी थी, संयोग देखिए कई जगह से उखड़ा हुआ सुइटर भी था गोया उस समय मैं एक दुरूस्त आदमी था जो आकाशवाणी के निदेशक से मिलने की हैसियत वाला था। बहरहाल निदेशक महोदय मेरे छोटे से मकान के छोटे से कमरे में दाखिल हुए। उनका कमरे में उपस्थित होना कमरे की दीवारों को हंसा गया देखो!
‘देखो! कौन आया है? मुझे भी लगा कि फर्श से लेकर छत तक सभी खुश व मस्त हैं। यह होता है व्यक्तित्व! विशेष सुविधाओं एवं अवसरों पर कुंडली मार कर बैठने वालों का प्रभाव, तुम्हारा मनहूस कमरा भी हंसने लगा।’
घेरलू औपचारिकता कस-मसाई...
‘चाय बगैरह तो पिलाओ साहब आए हैं।’
तो श्रीमान! यह सब हुआ इसी दौरान मालूम हुआ कि ये लोग चाय-पान की औपचारिकता निभाकर डा.अर्जुनदास केसरी के यहां से वापस लौटे हैं, फिर मालूम हुआ कि केसरी जी अतीत की आधुनिक चढ़ाई चढ़ने के लिए तैयार नहीं हुए...कृ
कोतवाल साहब का सोचना था कि वे विजयगढ़ किले की चढाई डा.केसरी के साथ चढ़ें तथा अपने मिजाज से तेरह-चौदह सौ साल के पुराने अतीत का साक्षात्कार करें।कृअतीत को जानने-बूझने में यदि कहीं बाधा हो तो डा.केसरी से पूछ लेते तथा अन्तर निकालते कि देवकी नन्दन खत्राी जी ने यहां के खास अतीत पर कल्पनाओं की कितनी मोटी पर्तें चढ़ाया है? मोटी किताबों व कल्पनाओं की मोटी पर्त में लिपटे डा.केसरी इतने सरल व सहज हैं कि बुद्धि व विवेक को वे खुला छोड़ रखने में यकीन करते हैं तथा अलाभकर स्थितियों से बुद्धि के घिसावों को रोक सकने में माहिर भी,
सो उन्होंने कोई-कीमती बहाना बना कर कोतवाल साहब की योजना से खुद को अलगिया लिया।
ढाई आंख वाले प्रशासनिक अधिकारी कोतवाल साहब ने आधी आंख से मुझे देखा..‘ शिवेन्द्र कैसे रहेंगे? उन्हें देख लिया जाये,उनका मकान भी तो रावटर््सगंज में है न।’
इस तरह मैं कोतवाल साहब की पकड़ में आ गया। पकड़ में तो आना ही था। सुशील राय हमेशा मेरी कमजोरी व मजबूरी रहे हैं। ‘निराला’ जी का प्यार छोड़ कर मुझे बेवकूफी नहीं करना था सो हम लोग चल दिए विजयगढ़ किले की चढ़ाई चढ़ने के लिए। आकाशवाणी की जीप सरसराती हुए दौड़ने लगी ठीक पूरब की तरफ...कृकृपहले चतरा, फिर धंधरौल बांध, वहां से नीचे मऊ। मऊ के बाद विजयगढ़ किले की तीन चार सौ फीट ऊँची चढ़ाई, रावटर््सगंज से कुल अठारह किलो मीटर ठीक पूरब की तरफ विजयगढ़ किला, एक समय का राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, प्रशासनिक वर्तमान, अब भूत....कृभूत बोलने लगा....
‘देखो ! मैं जीवित हूॅ, तुम्हारे इतिहास ने तो मेरी हत्या कर दी थी। मैं भूत हूॅ भूत के पास समय का लेखा-जोखा नहीं होता। वैसे कम से कम तेरह-चौदह सौ साल तो हो ही गए होंगे जब मुझे बनाया गया होगा। वनजीवी समूह के खैरवाहों ने मेरा
निर्माण कराया था। मदनशाह व घाटम का नाम तूने शायद सुना हो!
फिर भूत अवाक हो गया। धधरौल बांध के दक्षिणी सिरे से मऊ की तरफ जाने वाले रास्ते पर जीप मुड़ गई। जंगल विभाग की सड़क जगह-जगह टूट गई थी। सारा रास्ता पत्थरों के छोटे-बड़े टुकड़ों से पटा हुआ था। जीप चलती, उछलती, कूदती फिर धम्म से गिरती, इस उठा पटक में निदेशक कोतवाल साहब, कमी ‘आह! कभी ‘सी’ कह उठते। जीप की उठा-पटक से हम लोग भी परेशान थे।
‘ हे! सभ्य आदमियों! जीप की उठा-पटक से परेशान हो गए फिर किस तरह झेल पाओंगे अतीत की उठा-पटक? अतीत तो तोड़ डालेगा सारा मानसकि कार्य व्यवहार, जीवित बचना भी शायद शेष न रहे’
भूत नेे हम सभी को गंभीरता से चेताया....
अतीत के सवालों से दो चार होने की बातें रास्ते में कहीं छूटने लगीं। रास्ता धूल भरा था, हालाकि ठीक बरसात बाद रास्ते पर धूल नहीं जमा करती। मऊ गांव छूट रहा था, गांव के सारे प्रतीक जैसे सहस्त्रामुखी शिवलिंग दूर कहीं पड़ा था। इन पुरातात्विक वस्तुओं के अलावा ढेर सारी मूर्तियां जो लगभग दूसरी तीसरी सदी की जान पड़ती थीं सबके सब छूट रही हैं।
दरअसल भूत केवल कोतवाल साहब को ही नहीं हम सभी को भयभीत कर रहा
था। कहीं न कहीं मन के गहरे में भूत की सक्रियता तथा उसकी प्रभावोत्पादकता की गाढ़ी पर्तें जमी हुई थी। चलो पहले किला देखना है फिर कभी इन बिखरी मूर्तियों को देखा जाएगा। कोतवाल साहब ने सहजता से सुझाया। मऊ गांव का दक्षिणी किनारा वहां तक हम लोगों की जीप निर्वाध पहुंच गई। खपरैल का एक मकान एक दो कमरों वाला, मकान के सामने चालीस पचास साल साल की घांगर आदिवासी महिला.....
‘ क्या इसे मालूम होगा अपने पुरखे जूरा व बुद्ध भगत के बारे में?’ एक सवाल मेरे मन में आया तथा वहीं दब गया। ‘सीधे-सादे लोग अतीत-जीवी नहीं होते, ये वर्तमान से ही अपना रिश्ता कायम रखते हैं।’
इसी आदिवासी महिला के यहां हम लोगों ने पानी पिया। साथी सुशील राय ने बिस्कुट व नमकीन रखा हुआ था। बिस्कुट ने प्यास का रंग चोखा कर दिया। सुशील राय को खूब धन्यवाद मिला। आदिवासी महिला लोटा तथा पानी से भरी बाल्टी लेकर आतिथ्य के लिए मुस्तैद थी, उसके चेहरे पर स्वागत करने की इच्छा थिरक रही थी सुशील राय ने उस महिला को भी बिस्कुट व नमकीन दिया तथा पूछा..
किला चढ़ने में कितना समय लगेगा....
‘ एक घंटा लगेगा साहब! अभी एक महीना पहले यहां एक बहुत बड़ी मूर्ति मिली है साहब! चलिए देख लिजिए, मूर्ति जमीन की गहराई से निकालते समय उसके पैर का पंजा थोड़ा टूट गया है।’
दरअसल सामने वाली पहाड़ी पर एक आदमी अपना घर बनाने के लिए बुनियाद
खोद रहा था कि खट-खट की आवाज हुई, मूर्ति ठीक बुनियाद की सीध में थी। उस आदमी ने गांव वालों को बुलाया। उस रहस्यमय ‘खट’ वाली आवाज के बारे में कोई एकमत नहीं हो सका फिर तो सबने मिलकर खुदाई की। चार पांच घंटे की मेहनत के बाद किसी तरह मूर्ति निकल पाई। पूरी छह फीट काफी बजनी, दो तीन दिन तक गांव वालों ने सुबह से लेकर शाम तक मेहनत किया फिर मूर्ति पहाड़ी के नीचे लाई गई। उसे लोग चबूतरा वगैरह बनाकर स्थापित करने के बारे में सोच रहे हैं।
‘‘चलिए देख लीजिए साहब! बहुत अच्छी मूर्ति है? गिड़-गिड़ाने की तर्ज पर उस आदिवासी महिला ने हम सभी से निवेदन किया.....
पर हम लोग तो भूत के वशीकरण के प्रभाव में थे। किला देखना है देखने को पकड़ना है तथा पकडे हुए को फिर से देखना है। अतीत को समझने-बूझने की महत्वाकांक्षी दार्शनिक कोशिश करनी है। तीन चार सौ फीट ऊपर पहाड़ी पर किले की छाया दिख रही थी जिस और सूरज अपनी पूरी ताकत के साथ धूप फेंक रहा था। अठारहवीं सदी मंे सूरज की तरह से ही वारेन हेस्टिंग्स के सैनिकों ने दक्षिण की तरफ से किले की दक्षिणी दीवारों पर तोपें दगवाया था। किले के भीतर आदिवासी सरदार अपने पारंपरिक हथियारों का प्रयोग करने के लिए परेशान थे, उनके पास तोपें व बन्दूकें न थी। तीर, धनुष, भाला, सब्बल तथा तलवारें थीं। आदिवासी तोपों की गर्जनाएं सुनते, भयानक और कूर आक्रामण...
‘इतना तो शेर व चीता भी नहीं गरजते?’
अठारहवी सदी का बर्बर युद्ध विजयगढ़ किले में रासलीला रचाने के लिए दक्षिण की तरफ से आ रहा था। किले के भीतर फकीरशाह की मजार व हनुमान की मूर्ति दोनों तटस्थ व निर्पेक्ष थे। वर्तमान अपना चोला बदल रहा है कहीं कोई हरकत नहीं किले की राज-व्यवस्था वारेन हेस्टिंग्स की योजनाओं से कांप रही थी। एक छोटी ताकत छोटी मछली की तरह बड़ी मछली का खुराक बन रही थी। भूत ने अट्टहास करने लगा....
‘मदनशाह गया, घाटम गया, चला गया, उडन देव, फिर आया शिंभूशरण शाह, बलवन्त सिंह आया, सभी चले गये, देखो बनारस का अधिपति चेतसिंह भी जा रहा है। देखो-देखो! युद्ध का तमशा देखो ! युद्ध को आलिगंन-वद्ध होते देखो, कविता, कहानी के गंभीर बहसों की अभिव्यक्ति देखो! अचानक भूत की भाव भंगिमा बदल गई, उसने पलट कर पूछा...
‘हे वर्तमान के जीवित विचारवानों! क्या तुम युद्ध की भाषा व उसकी लिपि जानते हो? इक्कीसवीं सदी के आगमन का जश्श्न मना चुके हम लोग मुहब्बत व भाई-चारे के भिखारी की तरह किले की यात्रा कर रहे थे कि वहां देवकी नन्दन खत्राी जी के चन्द्रकान्ता सन्तति की नायिका चन्द्रकान्ता मिलेगी उसके कबूतर व हिरन मिलेंगे। उनके साथ होकर हम प्यार का जश्न मानएंगे पर यह साला भूत! जाने कैसा-कैसा सवाल पूछ रहा है। अभी किले की चढ़ाई बाकी है। किले पर पहुंचने के बाद फिर तो न जाने क्या-क्या पूछे? किले की चढ़ाई का चौथाई हिस्सा पीछे छुट गया है हम लोग एक ऐसे मोड़ पर आ चुके हैं, जहां से नीचे देखने पर सारा कुछ अदेखा हो रहा है। देखे हुए की ओर कम से कम मैं लौटने की कोशिश कर रहा हूॅ तथा उस पहाड़ी चट्टान को निरख रहा हूॅ जो चौड़ी ही नहीं समतल भी है, किसी चबूतरा की तरह, पर उठा हुआ चबूतरा बिना आधार वाला अवैज्ञानिक। आधार नहीं दिख रहा, मुड़कर आधार देखने की कोशिश करता हूॅ। किनारे की ओर कोई मजबूत गोल पत्थर दिखता है फिर अचानक चबूतरा वाली चट्टान पर बकरी का बच्चा मिमियाने लगता है। मानो इतिहास के अन्त की घोषणा कर रहा हो या कि देरिदा के बिखंडन का हवाला दे रहा हो। बहरहाल ऐसा कुछ भी नहीं होता, वह बकरी का बच्चा सिर्फ मिमिया रहा था हम जनता की तरह। कमोवेश हम सभी मिमियाने की कला से परिचित हैं।
इस चढ़ाई पर कुछ दूर चढ़कर हम सभी लोग बिना झाड़ियों वाली जगह पर ठहराव लेते हैं। सत्तावन-अठ्ठावन साल की उम्र कोतवाल साहब को थका गई है। थकान के पसीने उनके माथे पर छल-छला गए हैं। थकने की पकड़ में तो हम सभी हैं पर कोतवाल साहब कुछ इशारा करें तब नऽ...
‘कुछ आराम करके फिर ऊपर चढ़ा जाये, अभी कितनी दूरी पर होगा किला? दिख तो सामने रहा है, लगता है वह बुर्ज ही दिखने में आ रहा है सामने वाला,
कोतवाल साहब ने आहिस्ते से अनुमान किया।
तकरीबन एक घंटे में हम सभी लोग किले की चढ़ाई चढ़ने में सफल हो पाए। इस बीच हम सभी किले के निर्माण की कथा के बारे में बतियाते रहे। किले का निर्माण कथा दो असुरों से जुड़ी हुई है। दोनों में शर्त थी समरूप दो किला बनाने की तथा जो पहले बना लेगा वही जीवित रहेगा, दूसरा मारा जाएगा। दोनों असुरों को रात के अन्धेरे में किलों का निर्माण करना था तथा एक-एक दीया भी जलाए रखना था जो जब किले का निर्माण पूरा कर लेगा दीया बुझा देगा। जहां विजयगढ़ किला स्थित है उसके ठीक सामने इस पहाड़ी के समरूप ही एक दूसरी पहाड़ी लगभग दो मील की दूरी पर स्थित है। इसी दूसरी पहाड़ी पर दूसरे असुर को किले का निर्माण करना था।
किले का निर्माण प्रारंभ हुआ। विजयगढ़ किले के असुर की दीया अचानक बुझ गई सामने की पहाड़ी वाले असुर ने उसे देखा तथा जान बचाने की डर से भाग खड़ा हुआ कि विजयगढ़ किला पूरा हो चुका है। इधर विजयगढ़ किले के निर्माणकर्ता को मालूम ही न चला कि उसकी दीया बुझ गई है। जब इस असुर ने किले का निर्माण रात भर में पूरा कर लिया फिर दूसरी पहाड़ी की ओर देखा वहां दीया बुझी हुई थी फिर यह असुर भी डर कर कहीं भाग गया, इस प्रकार दोनों असुर भाग गए, लेकिन विजयगढ़ किला तो बन चुका था और उस असुर का कहीं अता-पता नहीं।
दन्त कथाओं में विजयगढ़ किले का निर्माण आसुरी ताकतों द्वारा कराया जाना
माना जाता है। इस तरह की दन्त कथाएं क्यों उपजती हैं इसका शायद मूल कारण
विज्ञान की अज्ञानता हो। जो चीज सहज ढंग से कर पाना संभव न जान पड़े उस का किया जाना आसुरी या दैवीय ताकतों का प्रभाव बता देना यह आसान तरीका तो आज भी प्रचलित है। तमाम सवाल हैं सूर्य की गर्मी, चांद की चांदनी के बाबत कि सूरज अस्त व उदय होने की परिकल्पना पर पूरा भारतीय नक्षत्रा ज्ञान ही टिका हुआ है जबकि सूरज व चांद दोनों न तो अस्त होते हैं न उदित होते हैं। अभी भी प्रकृति का बहुलांश विज्ञान की सीमाओं से परे हैं। ऐसी स्थिति में देवों या असुरों की कल्पनाएं मनुष्य को मानसिक रूप से आश्वस्त करती हैं तथा वह विज्ञान के ज्ञान की उलझनों में नहीं पड़ना चाहता। धीरे-धीरे किला पास होता जा रहा है। उसका मुख्य द्वार सामने दिख रहा है, इसी द्वार से बलवन्त सिंह अपने सैनिकों के साथ किले मंे प्रवेश किये होंगे। अचानक अठारहवीं सदी के घोड़े हिन-हिनाने लगते हैं। हाथी चिग्घाड़ने लगते हैं। तलवारों की चमक से आंखे चुघिया जाती हैं।
किले का सामने की जमीन युद्ध भूमि के रूप में तब्दील हो जाती हैं गनीमत यह हुई कि अतीत का भूत उस समय पूरे परिदृश्य से बाहर था। दिन के दो बजे हम सभी लोग किले के प्रमुख गेट में दाखिल हुए। किले का गेट जीवित बचा हुआ है उसके अगल-बगल की सीढ़ियां भी बची हुई हैं। किले के मुख्य-द्वार के ठीक सामने किले का ऊबड़-खाबड़ वर्तमान पड़ा हुआ था। आठ-नौ सौ साल पहले का अतीत इतने कम समय में अपाहिज हो जाएगा कौन जानता था? हजारों लोगों के खून से रंगी हुई किले की जमीन पर किसी भी प्रकार के सांस्कृतिक चिन्ह न बचे थे। हर ओर खंडहर ही खंडहर। किले की दीवारें कुछ साबूत थीं। पूर्वी हिस्से की तरफ गांव दिख रहे थे एकदम से छोटे-छोटे, हरे-भरे पेड़ों से लक-दक, उन गांवो को देखते बन रहा था। किला किसी टापू की तरह खड़ा था। चर्चित रामसागर पोखरा असमर्थ था पुरानी कहानी बताने में, फकीरशाह की मजार चुप थी, तथा हनुमान जी भी न बोलने की कसमें खाए हुए थे। हम सभी कल्पना करते हैं कि एक समय रहा होगा इस किले का...
इतना मजबूत किला अब बेकार व कमजोर। कैसा रहा होगा किले का समय?कृकृकृराजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, पंचाइत वाला, फैसलों वाला आदमी को दण्ड देने व दिलाने वाला...समझ, बुद्धि व चेतना का शक्ति-पीठ, अनिवार्य सत्ता केन्द्र कुछ ऐसा ही रहा होगा। हम कल्पनाओं में से सार तत्व निकाल रहे थे कि भूत की हंसी सुनाई पड़ी जो रामसागर पोखरे की तरफ से आ रही थी....
हमारा ध्यान पोखरे की तरफ गया।
‘ये दीवारों के खंडहर नहीं हैं इतिहास के हैं। किसी सत्ता केन्द्र के हैं,कृइसे देखने के लिए रोने व हंसने वाले दोनों यहां आते हैं। आलोचक जब कभी यहां आता है तब वह दोनों पर हंसता है। रोने वालों तथा हंसने वाले को वह धूल धूसरित करते हुए खुद स्थापित हो जाता है तथा बारी-बारी से दोनों को पटखनी देता है वैसे इस किले पर कोई आलोचक नहीं आया, यदि कभी आया तो...’
अचानक भूत खामोश हो गया फिर हम लोग रामसागर पोखरे के साफ पानी पर बातें करने लगे...
चार सौ फीट ऊँची पहाड़ी पर पानी! वह भी पत्थरों में से छनकर जबकि इस क्षेत्रा में बोंरिग से भी पानी नहीं मिलता यह भगवान या असुरों की लीला है।कृरामसागर पोखरे की इस मान्यता ने इस क्षेत्रा के लोगों को ईश्वर के प्रति काफी अनुरागी बनाया हुआ है।
वैज्ञानिक ऐसा नहीं मानते। उनका मानना है कि पहाड़ों के भीतर कोयले व चूने के पत्थरों की चट्टानों होती हैं। संयोग से यदि ये दोनों चट्टानों आपस में गुंथी हुई हैं तो ये दोनों मिलकर वैज्ञानिक क्रिया संपादित करती हैं जिसकी प्रति-क्रिया स्वरूप शुद्धजल का उत्सर्जन होता है। यही उत्सर्जित जल इस पोखरे में है पर इस वैज्ञानिक सचाई को कितने जानते हैं? तथा वे क्यों जाने? परमात्मा की लीला मान लेना बहुत ही सहज है। यही है देव लीला का अस्थावाद। सोनभद्र के पुरखों की इस वैज्ञानिक उपलब्धि रामसागर पोखरे का दैवीकरण दैवी प्रतिफलन।
किले का क्षेत्राफल कम से कम चार-पांच वर्ग किलोमीटर तक का तो होगा ही। कोतवाल साहब जिनका रिश्ता लखनऊ व दिल्ली से ही अधिक रहा है, वे हतप्रभ
थे। सोनभद्र जैसे पिछड़े जनपद में इतिहास के इस विकसित धरोहर को देखकर यकीन नहीं होता कि सोनभद्र का अतीत कभी गौरवशाली था।
किले पर जीवित कचहरी, रनिवास तथा एक दो दूसरे भवन प्रकृति के शिकार हो चुके थे, वे भहरा रहे थे। उनमें से निकले पत्थरों के चौखटों, कड़ियों आदि को स्थानीय प्रभावशालियों ने उठवा लिया था। ठीक दक्षिण तथा पश्चिम के कोने पर जिधर से खिड़की थी, किले की दीवारें ढही हुई थीं। वारेन हेस्टिंग्स के सैनिकों की की तोपों ने इसी स्थान पर आग उगलती तोपों से हमला किया था। मऊ गांव के लोग बताते हैं कि उनकी घांगर (ओरांव) विरादरी ने बहुत बहादुरी के साथ वारेन हेस्टिंग्स के सैनिकों का मुकाबिल किया था। कौन थे वे लोग जो अंग्रेजों से युद्ध किये थे? धांगर जाति के लोगों को उनका नाम याद नहीं, पिछड़े व गरीब लोग शायद अपने पुरखों को याद रखना आवश्यक नहीं समझते। ऐसे लोगांे के लिए किसी देश के भूगोल या इतिहास से क्या मतलब?
‘उन्हें रोटी चाहिए तथा रात की निर्वाध नींद।’ घोटुल की परंपरा चाहिए तथा चाहिए उन्मुक्त जीवन। निषेधों व वर्जनाओं से अलग हटकर सामाजिकी के सिद्धान्तों का प्राकृतिक चलन ही उनके लिए अनिवार्य सा हो गया है अब जिसे जैसा समझ में आये उनके बारे मंे सिद्धान्त रचे। उनके पारंपरिक गीत करमा की चाहे जैसी व्याख्या करे।कृकरमा नृत्य का प्रस्तुतीकरण चाहे रावटर््सगंज में कराए या उसे ‘महलिया’ नृत्य बना कर खुद ऐश करे व पुरस्कार ले यह उसकी मर्जी पर। वे आज पूरी तरह समाज की गतिकी से विमुख होकर अपने ऊपर आत्म-मुग्ध होने वाले प्राणी बन चुके हैं एकदम से तटस्थ व निर्पेक्ष। विजयगढ़ किले का लम्बा अतीत,किले पर छोड़ का हम लोग उतर रहे थे कि किसी पुरस्कार प्राप्त जासूस की तरह भूत ने आखिरी बार हम सभी को टोका..क्यों विचारवानों! कैसा लगा तुम्हें अपना अतीत? यह सवाल शायद मुझसे था।
‘सुन्दर, काल्पनिक, हास्यास्पद चिन्तनीय या कैसा ? कुछ हमें भी तो सुनाओ। तुम लोग स्थिति-प्रज्ञ की तरह किले से ऐसे उतर रहे हो जैसे यहां कुछ हुआ ही नहीं था। मैं भी तुम लोगों के पीछे-पीछे चल रहा हूॅ। अब मैं तुम्हारी अगली पीढियों से हिन्डाल्कों, श्शक्तिनगर, बीजपुर, ओबरा, बीना, ककरी जैसी कोयला-खदानों के आस-पास घूमता-टहलता मिलंूगा फिलहाल मेरा अस्थाई ठिकाना डाला व चुर्क की बन्द पड़ी सीमेन्ट फैक्टरियों में है। मौका लगे तो वहां भी आना मैं वही मिलूगां मेरी बातों का बुरा मत मानना भाई! अच्छा सभी को राम राम! सूर्यास्त होने के पूर्व तक हम लोग किला से उतर आए। मऊ गांव व धधरौल पार करते समय अन्धेरे ने हमें घेर लिया था। कोतवाल साहब! आशंकित थे..यार! इधर पार्टी वाले रहते हैं नऽ। यही मऊ है जहां पुलिस मुठभेड़ हुई थी। इस प्रकार अतीत से साक्षात्कार का एक मौका अतीत बन रहा था जिस पर आकाशवाणी के लोगों के साथ मैं भी घूम रहा था, कभी
किसी पड़ाव पर तो कभी किसी पड़ाव पर। अतीत के पड़ाव तो हमलोगों ने बहुत
देखे पर किले पर कहीं भी देवकी नन्दन जी की कल्पित चन्द्रकान्ता नहीं दिखी, दिखती भी कैसे वह थी ही नहीं। पता नहीं कैसे हमलोगों के मन की बात किले का
भूत जान गया और...
अरे! मूर्खों... इतना भी नहीं समझते कि देवकी नन्दन खत्राी करते क्या, उन्हें
खंडहराते किले से अपने लेखन को चमकाना था और उन्होंने चमका लिया, तुम लोग भी चाहो तो कोई दूसरी कहानी गढ़ लो किले के बाबत कौन रोक रहा है, तुमलोग चन्द्रकान्ता के बजाय मधुमालती को ले लो, किले के बाबत तरह तरह के रहस्य गढ़ लो, आदिवासी राजा के बजाय सवर्ण राजा को ले लो, कुछ तो करो। किले से लौटते समय रास्ते में कहीं भूत नहीं मिला वह भी शायद अन्धेरे से डर गया होगा।

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